✍️ डॉ. बसंत गोयल, सीईओ और फाउंडर – गोयल मेडिकोज
शहर की किसी भी सड़क पर निकल जाइए—हर चौराहे पर आपको फटेहाल कपड़ों में महिलाएं, मासूम बच्चों के साथ भीख मांगते पुरुष और किन्नरों के समूह मिल जाएंगे। बुझी-बुझी आंखें, कांपते होंठ और चेहरे पर दर्द का गहरा असर यह कहने को मजबूर करता है:
क्या यही ज़िंदगी है?
लेकिन इस तस्वीर के कई पहलू हैं।
भीख – मजबूरी या धंधा?
भीख मांगना एक सामाजिक विडंबना है। कुछ लोग मजबूरी में इसमें धकेल दिए जाते हैं, तो हजारों ऐसे भी हैं जिन्होंने इसे पेशा बना लिया है।
आंकड़े बताते हैं कि कई भिखारी रोजाना हजारों रुपये कमा लेते हैं—शायद उतना भी नहीं जितना एक ग्रेजुएट पढ़-लिखकर कमा पाता हो।
सबसे चिंताजनक तथ्य यह है कि भीख मांगने वालों में बच्चों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। सात से दस साल के मासूम बच्चे चौराहों पर दिखते हैं, जिनकी असली जगह स्कूल होनी चाहिए थी।
कानून तो है, पर कार्रवाई क्यों नहीं?
दिल्ली और मुंबई जैसे राज्यों में Bombay Prevention of Begging Act (1959) लागू है, जिसके अनुसार भीख मांगना गंभीर अपराध है।
लेकिन विडंबना यह है कि इन्हीं शहरों में यह धंधा सबसे ज़्यादा फल-फूल रहा है।
2011 की जनगणना में पाया गया कि 14 साल से कम आयु के 3.7 लाख से अधिक बच्चे भिखारियों में शामिल थे। दुख की बात यह है कि यह जांच तक नहीं हुई कि उन्हें इस स्थिति में धकेला किसने।
मासूमों का शोषण और मानव तस्करी
मानव तस्करी से जुड़ी कहानियां और भी भयावह हैं।
2016 में 16,000 बच्चों को बचाया गया, जिनमें से लगभग 4,871 बच्चे भीख मंगवाए जा रहे थे।
इन बच्चों को नशीली दवाएं दी जाती थीं, पीटा जाता था, हाथ-पैर तोड़े जाते थे ताकि लोग सहानुभूति दिखाकर अधिक पैसा दें।
क्या प्रशासन ने कभी यह जांच की कि महिलाओं की गोद में जो मासूम बीमार-सा दिखता है, वह सचमुच उनका बच्चा है या केवल इमोशनल कार्ड?
आज डीएनए टेस्ट जैसे आधुनिक साधन मौजूद हैं, फिर भी इस दिशा में ठोस कदम क्यों नहीं उठाए जाते?
किन्नर समाज और आस्था का सवाल
भारतीय समाज में किन्नरों को दान देने की परंपरा है। लेकिन सवाल यह उठता है कि उन्हें भीख ही क्यों मांगनी पड़े?
क्या सरकार ने कभी सोचा कि इस समुदाय के लिए रोज़गार और पुनर्वास योजनाओं को कैसे मज़बूत किया जाए?
जिम्मेदारी किसकी है?
कानून साफ है—किशोर न्याय अधिनियम 2015 की धारा 76 के तहत किसी से भीख मंगवाना मानव तस्करी की श्रेणी में आता है, जिसमें पांच साल की सजा और एक लाख रुपये तक का जुर्माना हो सकता है।
लेकिन सवाल वही है—कार्रवाई कौन करेगा?
पुलिस और प्रशासन की अनदेखी, और सरकार की चुप्पी ने इस संगठित अपराध को इतना मजबूत बना दिया है कि अब यह समाज के हर हिस्से को खा रहा है।
निष्कर्ष
भीख मांगना सिर्फ गरीबी की निशानी नहीं, बल्कि एक संगठित अपराध, शोषण और संवेदनहीनता का आईना है।
आज ज़रूरत है कि सरकार और समाज मिलकर इन मासूमों को इस धंधे से बाहर निकालें। पुनर्वास योजनाएं कागज़ों तक सीमित न रहकर जमीन पर उतरें।
क्योंकि—
जब मासूम आंखों में सपने बुझ जाते हैं, तब पूरा समाज अंधेरे में चला जाता है।